दोहा:
विष्णु सुनिए विनय हमारी।
अति दीन दयालु भगत हितकारी॥
चौपाई:
चौरासी के बंध छुड़ाओ।
पाप मिटाकर पुण्य बढ़ाओ॥
नील जलद तन श्याम तुम्हारा।
सकल सृष्टि के पालनहारा॥
शंख चक्र गदा पद्म धारी।
भक्त जनों के संकट हारी॥
वैकुण्ठ धाम निवास तुम्हारा।
जहाँ नहीं दुख का अंधियारा॥
लक्ष्मीपति तुम जग के स्वामी।
त्रिभुवन में फैली है धामी॥
देवों के तुम देव निराले।
करते भक्तों के रखवाले॥
जो कोई तुमको ध्याता है।
संकट सबका मिट जाता है॥
तुम ही ब्रह्मा तुम ही शिव हो।
तुम ही जग के पालन कर्ता॥
दशावतार धारण कर लीन्हे।
धर्म रक्षा हेतु प्रवीण॥
मत्स्य रूप धरि वेद बचाए।
कूर्म रूप धरि मंदर उठाए॥
वराह रूप धरि धरती तारी।
नरसिंह बन भक्त उबारी॥
वामन रूप धरि बलि को तारा।
परशुराम क्षत्रिय संहारा॥
राम रूप धरि रावण मारा।
कृष्ण रूप धरि कंस संहारा॥
बुद्ध रूप धरि ज्ञान सिखाया।
कल्कि रूप धरि अंत दिखाया॥
भक्तों के तुम हो रखवाले।
संकट हरते दीन दयाले॥
जो यह पाठ करे मन लाई।
ताकी हर बाधा मिट जाई॥
सुख संपत्ति घर में आए।
दुख दरिद्रता दूर भगाए॥
श्रद्धा से जो ध्यान लगावे।
अंत समय वैकुण्ठ को पावे॥
दोहा (समापन):
विष्णु चालीसा जो पढ़े, प्रेम सहित मन लाई।
सकल मनोरथ पूर्ण हों, कष्ट मिटे सब भाई॥